ॐ श्री हनुमते नमः
ॐ श्री गणेशाय नमः
ॐ श्री सीतारामाय नमः

मंदिर का इतिहास

अलीगंज, लखनऊ में स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर का इतिहास

कभी लक्ष्मणपुर कहलाने वाली इस नगरी से होकर प्रवाहित होती हुई गोमती के उस पार 19वीं शताब्दी के आरम्भ में नवाब शुजाउद्दौला की पत्नी, नवाब वाजिद अली शाह की दादी तथा दिल्ली के मुगलिया खानदान की बेटी आलिया बेगम द्वारा बसाये गये अलीगंज मोहल्ले में एक हनुमान मंदिर है जिस पर ज्येष्ठ मास के प्रत्येक मंगलवार को श्रद्धापूर्वक मनौतियां मानी जाती हैं। लखनऊ में मोहर्रम और अलीगंज का महावीर मेला ये दो सबसे बड़े मेले होते हैं। मेले में हजारों लोग केवल लाल लंगोट पहनकर दण्डवती परिक्रमा करते हुए मंदिर पहुँचते हैं। जहाँ भी नया हनुमान मंदिर बनता है वहाँ की मूर्ति के लिये पोशाक, सिंदूर, लंगोटा, घण्टा और छत्र आदि यहाँ से बिना मूल्य दिये जाते हैं।

इस मंदिर की स्थापना तथा देखभाल में अवध के उदार मुसलमानों का मुख्य योगदान रहा है। अलीगंज के अन्तिम छोर पर स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर की तुलना में इस मंदिर की मान्यता अधिक है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार इसका संबंध रामायण काल से है। जब श्री रामचन्द्र जी ने सीता जी को त्यागने का निश्चय किया और श्री लक्ष्मण जी तथा श्री हनुमान जी उन्हें बिठूर (वाल्मीकि आश्रम) ले जा रहे थे, तब वर्तमान अलीगंज क्षेत्र में रात्रि विश्राम हुआ। लक्ष्मण टीला और हीवेट पॉलीटेक्निक के निकट स्थित क्षेत्र का उल्लेख मिलता है।

कालान्तर में वहाँ एक मंदिर बना जिसे हनुमान बाड़ी कहा गया। 14वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने इसका नाम बदलकर इस्लामबाड़ी रख दिया।

सन् 1792 से 1802 के बीच अवध के नवाब मुहम्मद अली शाह की बेगम रबिया बेगम को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद यहीं से मिला। स्वप्नादेश के अनुसार यहाँ से हनुमान जी की मूर्ति निकाली गई। मूर्ति को आसफुद्दौला के बड़े इमामबाड़े के पास प्रतिष्ठित करने हेतु ले जाया जा रहा था, किन्तु हाथी ने वर्तमान अलीगंज स्थल पर रुककर आगे बढ़ने से इंकार कर दिया। इसे हनुमान जी की इच्छा मानकर वहीं मंदिर का निर्माण कराया गया।

मंदिर की भूमि महमूदाबाद रियासत द्वारा प्रदान की गई। प्लेग महामारी के समय यहाँ आकर लोगों को स्वास्थ्य लाभ हुआ, जिसके बाद से यहाँ मेला लगना प्रारम्भ हुआ।

एक अन्य किंवदन्ती के अनुसार नवाब वाजिद अली शाह की दादी आलिया बेगम के रोगमुक्त होने पर यहाँ भव्य उत्सव हुआ और लाखों की खैरात बाँटी गई। तभी से मेले की परंपरा प्रारम्भ हुई और क्षेत्र का नाम अलीगंज पड़ा।

तीसरी किंवदन्ती मारवाड़ी व्यापारी जटमल से जुड़ी है। उसकी केसर-कस्तूरी को कैसरबाग निर्माण के लिए खरीदा गया। प्रसन्न होकर उसने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। वर्तमान स्तूप (गुंबद) तथा मूर्ति पर लगा छत्र उसी के द्वारा बनवाया गया। तभी से यहाँ नियमित रूप से महावीर मेला आयोजित होने लगा।